Navratri Vrat Katha in Hindi ! Navratri ki Katha in Hindi

Navratri Vrat Katha in Hindi ! Navratri ki Katha Navratri Vrat Katha in Hindi

 

जय माँ दुर्गा, आप सभी को Navratri Puja की ढेर सारी भकामनाएँl आप सभी भक्तों के लिए नवरात्रि व्रत कथा का एक सम्पूर्ण आर्टिकल प्रकाशित किया जा रहा हैl Navratri Vrat Katha in Hindi Navratri Vrat Katha in Hindi navratri katha

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Navratri Vrat Katha in Hindi

वैसे तो दुर्गा—पूजन के लिए कोई भी दिन शुभ और उपयुक्त माना गया है, परन्तु प्रत्येक अष्टमी अथवा प्रत्येक शुक्रवार, चैत्र, आषढ़, आश्विन और माघ मास के शुक्लपक्ष में नौ दिन तक दुर्गा की आराधना की जाती है। अधिकांश श्रद्धालु चैत्र और आश्विन मास में नौ​ दिन तक भगवती दुर्गा की आराधना करते हैं। नौ दिन तक भगवती दुर्गा की आराधना करते हैं। संयोग से इन्हीं शारदीय और बोधन नवरात्र में भगवान श्रीराम की आराधना भी होती है। नवरात्र के सम्बन्ध में पौराणिक कथाओं के अतिरिक्त निम्नलिखित कथा की प्रचलित है—

देवताओं के गुरू बृहस्पति ने एक बार ब्रह्माजी से पूछा, ”हे ब्रह्मा ! आप सभी शास्त्रों को जाननेवाले हैं। आप कृपा करके बताएँ कि माँ भगवती की प्रसन्नता के लिए किया जानेवाला नवरात्र व्रत क्यों किया जाता है ? इस व्रत को पहले किसने किया और इस व्रत का फल क्या है?”

श्री ब्रह्माजी ने कहा, ”हे देवगुरू ! आपने जगत के कल्याण के लिए यह अच्छा प्रश्न किया है। प्रत्येक वर्ष चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ मास के शुक्ल पक्ष को नवरात्र व्रत किए जाते हैं। इन चारों में भी चैत्र और आश्विन मास के नवरात्र प्रमुख माने गए हैं। इन नवरात्रों में व्रत करनेवालों की सभी कामनाएं पूर्ण होती हैं। माता भगवती की कृपा से व्रत, पूजन ओर कथा—श्रवण के साथ दान—पुण्य करनेवाली मोक्ष का अधिकारी बनता है। नवरात्र व्रत करनेवाला धन, विद्या, पुत्रादि प्राप्त करता है। इस व्रत को न करनेवाला मनुष्य उत्तम धन से रहित होकर पृथ्वी पर सम्मान नहीं पाता समय भोजन कर ले और उस दिन बांधवों सहित नवरात्र व्रत कथा का श्रवण करे। हे बृहस्पते ! जिसने पहले इस महाव्रत को किया, उसका पवित्र इतिहास मैं तुम्हें सुनाता हूँ।” इस प्रकार ब्रह्माजी का वचन सुनकर बृहस्पतिजी बोले, ”इस कल्याणकारी व्रत के इतिहास को मैं सावधान होकर सुन रहा हूँ। कृपया सविस्तार कहें।

ब्रह्माजी बोले, ”पीठत नामक मनोहर नगर में सुनाथ नाम का एक ब्राह्मण रहता था। वह भगवती दुर्गा का परमभक्त था। उसके परिवार में सुमति नाम की एक अत्यन्त सुन्दर पुत्री पैदा हुई। वह कन्या अपने पिता के घर में शुक्ल पक्ष की चन्द्रकला के समान बढ़ने लगी। उसका पिता प्रतिदिन दुर्गा की पूजा और होम करता था। कन्या भी नियम से पूजा में उपस्थित होती थीं एक दिन सुमति अपनी सखियों के साथ खेल में लग गई और भगवती के पूजन में देर से उपस्थित हुई। ब्राह्मण ने समझा कि उसकी पुत्री की पुजा में रूचि नहीं है। वह अपना बनाव—श्रंगार ही जरूरी समझती है। उसने क्रोध में आकर सोचा, ‘मैं इसे अब ऐसी जगह ब्याह दूँगा, जहाँ इसका रूपरंग व्यर्थ हो जाए।’ यह सोचकर ब्राह्मण ने समझा कि उसकी पुत्री क पूजा में रूचि नहीं है। वह अपना बनाव—श्रंगृार ही जरूरी समझती है। उसने क्रोध में आकर सोचा, ‘मैं इसे अब ऐसी जगह ब्याह दूँगा, जहाँ इसका रूपरंग व्यर्थ हो जाए।’ यह सोचकर ब्राह्मण ने कहा—”बेटी ! तू मेरा कहा नहीं सुनती है, तेरा बहुत बुरा हेागा।” पुत्री ने बड़ी विनम्रता से कहा— ”पिताजी ! माँ मेरी रक्षक हैं। भाग्य का लिखा मिटता नहीं।” पुत्री की ऐसी बात सुनकर पिता को क्रोध आया और पुत्री से कहने लगा—”पुत्री ! तूने भगवती का पूजन नहीं किया। अब मैं कुष्ठी और दरिद्री के साथ तेरा विवाह करूँगा।” इस प्रकार कुपित पिता का वचन सुनकर सुमति को बड़ा दुख हुआ। वह बोली—’पिताजी ! मैं आपकी कन्या हूं। सब तरह से आपके अधीन हूँ। जहाँ आपकी इच्छा हो, वहाँ विवाह कर सकते हैं। होगा वही जो मेरे भाग्य में लिखा है। मेरा तो इस पर पूर्ण विश्वास है। मनुष्य अनेक मनोरथों का भाग्य में लिखा है। मेरा तो इस पर पूर्ण विश्वास है। मनुष्य अनेक मनोरथों का चिंतन करता है पर होता वही है जो विधाता ने भाग्य में लिखा है।”

अपनी कन्या के ऐसे निर्भीक वचन सुनकर ब्राह्मण को और अधिक क्रोध आया। उसने अपनी कन्या का विवाह एक कुष्ठी के साथ कर दिया और बोला—”देखता हूँ कि भाग्य के भरोसे रहकर अब तू क्या करेगी ?” इस प्रकार पिता के कठोर व्यवहार को देख सुमति अपने पति के साथ वन में चली गई। इस भयावह वन में सुमति और उसके पति ने रात कष्ट में बिताई। सारी रात वह दम्पति भगवान का ध्यान करता रहा। माँ बड़ी दयालु हैं। सुमति का दु:ख देख द्रवित होकर भगवती प्रकट हो गईं। वह सुमति से कहने लगीं, ‘हे पुत्री ! मैं तुम पर प्रसन्न हूँ। तुम जो  चाहो वरदान मांग सकती हो। मैं प्रसन्न होने पर मनवांछित फल देनेवाली हूँ। इस प्रकार भगवती दुर्गा का वचन सुन सुमति ने पूछा, ‘आप कौन हैं, जो मुझ पर प्रसन्न हुईं। यह सब मुझसे कहें और अपनी कृपा दृष्टि से मुझ दीन दासी को कृतार्थ करें। ‘सुमति का वचन सुनकर देवी बोलीं, ”मैं आदिशक्ति हूँ और मैं ही ब्रह्मविद्या और सरस्वती हूँ। मैं प्रसन्न होने पर प्राणियों का दुख दूर कर उनको सुख प्रदान करती हूँ। ” सुमति माँ के चरणों में गिर गईं। उसने हाथ जोड़कर पूछा, ”हे माँ, किन कारणों से मेरी यह दुर्गति हुई है ? इस जन्म में तो मैंने कोई पाप नहीं किया। आप कृपाकर मेरे पूर्व जन्म के बारे में बताएँ।”

भगवती ने कहा— ”मैं तुम्हें तुम्हारे पूर्व जन्म का वृतान्त सुनाती हूँ। तुम पूर्व जन्म में निषाद(भील) की पतिव्रता स्त्री थी। एक दिन तुम्हारे निषाद पति ने चोरी की। चोरी करने के कारण तुम दोनों को सिपाहियों ने पकड़ लिया और कारागृह में डाल दिया। उन लोगों ने तुम्हें और तुम्हारे पति को भाजन नहीं दिया। भाग्य से वह दिन नवरात्र था। नवरात्र में तुम्हें न तो खाने को अन्न मिला और न पीने को जल मिला। इस प्रकार नौ दिन तक नवरात्र का व्रत हो गया। हे सुमति ! उन दिनों में जो व्रत हुआ उस व्रत के प्रभाव से प्रसन्न होकर तुम्हें उत्तम परिवार मिला था। उसी जन्म के व्रत के प्रभाव से मैंने दर्शन दिए हैं। अब तुम्हें मनवांछित वस्तु मिल रही है। तुम्हारी जो इच्छा होसो माँगो।’ माँ दुर्गा के इस प्रकार के वचन सुन सुमति बोली, ”अगर आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो हे मां ! कृपया मेरे पति का कोढ़ दूर कर दें।” देवी बोलीं, ”उन दिनों जो तुमने जो व्रत किया उस व्रत के मात्र एक दिन का पुण्य अपने पति को कोढ़ ठीक करने के लिए अर्पण करो। मेरे प्रभाव से मुम्हारा पति कोढ़ से रहित हो जाएगा।”

माँ दुर्गा को महिमा अपरम्पार है। किसी भी जन्म में किया गया पुण्य, उनका नाम—स्मरण, व्रत आदि भक्त को मनचाहा वरदान देता है। श्रीब्रह्माजी ने कहा, ”देवी के वचन सुनकर सुमति बहुत प्रसन्न हुई। अपने पति को नीरोग करने की इच्छा से मां दु्र्गा को प्रणाम कर बोली, ‘मां ! तुम मुझ पर कृपा करो और अपने पूजन का फल देकर मेरे पति को नीरोग कर दो।” तत्क्षण ही सुमति के पति का शरीर भगवती दुर्गा की कृपा से कांतियुक्त हो गया। पति की मनोहर देह को देख सुमति मां की स्तुति करने लगी। उसने कहा, ”हे दुर्गे ! आप दुर्गति को दुर करनेवाली, तीनों लोकों का सन्ताप हरनेवाली, समस्त दु:खों को दूर करनेवाली, रोगी मनुष्य को नीरोग करनेवाली, प्रसन्न होने पर मनवांछित वस्तु देनेवाली और दुष्टों का नाश करनेवाली हैं। सारे जगत् की आप ही माता और पिता हैं। हे अम्बे ! मेरे छोटे से अपराध पर मेरे पिता ने एक कुष्ठी के साथ मेरा विवाह किया था। आपने मेरा उद्धार किया है। हे देवी ! मैं आपको प्रणाम करती हूँ। आपने मुझ दीन की रक्षा की।” इस प्रकार वन्दना कर सुमति माँ के चरणों में गिर पड़ी।

ब्रह्माजी बोल, ”वृहस्पति ! सुमति ने मन से देवी की स्तुति की थी इसलिए दवी बहुत संतुष्ट हुईं। वह सुमति से बोलीं, ‘हे पुत्री ! तेरे उद्दालक नाम का अति बुद्धिमान धनवान, कीर्तिमान जितेन्द्रिय पुत्र पैदा होगा।’ ऐसा कह देवी उससे फिर कहने लगीं, ‘हे पुत्री ! और भी कुछ हो तो मांग सकती है। भगवती दुर्गा के वचन सुनकर सुमति बोली, ‘हे दुर्गे ! अगर आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो कृपा कर मुझे नवरात्र—व्रत विधि बतलाइए।

हे दयावती ! जिस विधि से नवरात्र व्रत करने से आप प्रसन्न होती हैं, उस विधि और उसके फल का विस्तार से वर्णन करें। सुमति के वचन सुनकर देवी बोलीं,’हे पुत्री ! मैं तुम्हारे लिए सम्पूर्ण पापों को दूर करने वाली नवरात्र—व्रत विधि बताती हूं, जिससे मनुष्य पापों से छूटकर मोक्ष की प्राप्ति करता है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से लेकर नौ दिन तक विधिपूर्वक व्रत करें। यदि दिनभर व्रत न कर सकें तो एक समय भोजन करें। योग्य ब्राह्मण से पूछकर घट की स्थापना करें और वाटिका बनाकर उसको प्रतिदिन जल से सीचें । महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की मूर्तियां बनाकर नित्य विधि—विधान सहित पूजा करें और अर्ध् दें। बिजौरे के फूल से अर्ध् देने से रूप की प्राप्ति होती है। जायफल से कीर्ति और दाख से कार्य की सिद्धि होती है। आंवले से सुख और केले से आभूषण की प्राप्ति होती है। इस प्रकार फलों से अर्ध् देकर यथाविधि हवन करें। खांड, घी, गेहूं, जौ, बिल्वपत्र, नारियल, दाख और कदम्ब से हवन करें। गेहूं से होम करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। खीर से परिवार वृद्धि, चम्पा पुष्पों से धन और सुख और सम्पत्ति की प्राप्ति होती है। खांड, घी नारियल, शहद, जौ और तिल इनसे तथा फलों से होम करने से मनवांछित वस्तु की प्राप्ति होती है। व्रत करनेवाला मनुष्य इस विधान से होम करने के पश्चात् आचार्य को अत्यन्त नम्रता के साथ प्रणाम करे और यज्ञ की सिद्धि के लिए उसे दक्षिणा दे। इस महाव्रत को पहले बताई हुई विधि के अनुसार जो कोई करता है उसके सब मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं। इसमें तनिक भी संशय नहीं है। इन नौ दिनों में जो कुछ दान दिया जाता है, उसका फल करोड़ों गुना मिलता है। नवरात्र के व्रत करने से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है।’

नवरात्र में भगवती के पूजन—हवन की यह विधि जान सुमति प्रसन्न हो गई। ‘हे देवगुरू बृहस्पति !सम्पूण्र कामनाओं को पूर्ण करनेवाले इस अत्तम व्रत को तीर्थ देवी मन्दिर अथवा सुविधा हो तो घर में ही विधि के अनुसार करें। कवच, कीलक, अर्गला स्तोत्र का पाठ, हवन, पुराण पाठ के साथ भगवती का पूजन करना चाहिए। नवरात्र व्रत की विधि और फल बताकर देवी अन्तर्धान हो गई। जो पुरूष या स्त्री इस व्रत को भक्तिपूर्वक करता है, वह इस लोक में सुख पाकर अन्त में मोक्ष पाता है।’

Navratri Vrat Katha in Hindi की कहानी सम्पूर्ण हुआl 

 

माँ दुर्गा की उत्पत्ति की कहानी/दुर्गा माता की कहानी

माँ दुर्गा को आदि शक्ति, भवानी और जगदम्बा जैसे कई नामों से पूजते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार राक्षसों का सर्वनाश करने के लिए माँ दुर्गा अवतरण हुआ है। इसीकारण हम नवरात्र में माँ दुर्गा का श्रद्धा पूर्वक पूजा करते है। नवरात्र में पूजा करने से श्रद्धा और भक्ति का फल जल्दी मिलता है।  माँ को प्रसन्न करने के लिए पूर्ण विधि—विधान से पूजा—पाठ एवं दुर्गासप्तशती का पाठ किया जाता है।

प्राचीन कथा के अनुसार महिषासुर एक शक्तिशाली असुर था वह इंसान वह भैंसे का रूप धारण कर सकता था। उन्होनें अमरत्व का वरदान प्राप्त करने के लिए ब्रहमा जी का कठिन तपस्या की। ब्रहमाजी उसके तप से प्रसन्न होकर इच्छानुसार वर मांगने को कहा। महिषासुर ने उनसे अमर होने का वरदान मांगा ब्रहम जी ने कहा जिस जीव की मृत्यु होती है उसकी मृत्यु निश्चित होती कोई अन्य वरदान मांगो। महिषासुर ने कहा आप मुझे यह वरदान दीजिए कि मुझे देवता, असुर और कोई भी मुझे न मार पाये और मेरी मृत्यु किसी स्त्री के हाथ हो।ब्रहमा जी ने कहा ऐसा ही होगा। वरदान के अहम में महिषासुर ने तीनों लोकों पर आतंक मचाना शुरू कर दिया  तब देवताओं ने महिषासुर से अक्रांत होकर सभी देवताओं ने माँ दुर्गा की अस्तुति की और तब जाकर देवी की उत्पति हुई देवी के साथ महिषासुर का नौ दिनों तक भीषण युद्ध चला माता ने उसका वध किया देवी की अट्टास से करोड़ों—अरबों असुर मुत्यु को प्राप्त हुए।

 

Navratri Vrat Aarti in Hindi

माँ दुर्गा की आरती

जय अम्बे गौरी मैया जय श्याम गौरी ।

तुमको निशिदिन ध्यावत हरि ब्रह्मा शिवरी ।।

माँग सिंदूर विराजत टीको मृगमद को ।

उज्ज्वल से दोउ नैना चन्द्रबदन नीको ।। जय।।

कनक समान कलेवर रक्ताम्बर राजै ।

रक्तपुष्प गलमाला कंठन पर साजै ।।  जय।।

केहरि वाहन राजत खड्ग खप्परधारी ।

सुर—नर मुनिजन सेवक तिनके दु:खहारी ।। जय।।

कानन कुंडल शोभित नासाग्रे मोती ।

कोटिक चन्द्र दिवाकर राजत सम ज्योति ।। जय।।

शुम्भ निशुम्भ विडारे महिषासुर घाती ।

धूम्र विलोचन नैना निशिदिन मदमाती ।। जय।।

चौंसठ योगिनी गावत नृत्य करत भैरूँ ।

बाजत ताल मृदंगा अरू बाजत डमरू ।। जय।।

तुम हो जग की माता तुम ही हो भर्ता ।

संतन की दु:खहर्ता सुख सम्पत्ति कर्ता ।। जय।।

भुजा चार अति शोभित खड्ग खप्परधारी ।

मनवांछित फल पावत सेवत नर नारी ।। जय।।

 

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