Ma Durga ki Kahani Story of Maa Durga in Hindi

Ma Durga ki Kahani Story of Maa Durga in Hindi Durga Mata ki Kahani

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Ma Durga ki Kahani In Hindi

माँ दुर्गा का परिचय/Story of Maa Durga

शिवपुराण में दुर्गा की उत्पत्ति के संबंध में कथा है कि प्राचीनकाल में दुर्गम नामक एक बलवान राक्षम उत्पन्न हुआ। उसने ब्रह्मा से वरदान प्राप्त कर देवताओं को परेशान करना शुरू कर दिया जिससे धर्म की हानि होने लगी। देवताओं ने माँ भगवती से प्रार्थना की—” हे माँ भगवती ! जिस प्रकार आपने शुम्भ—निशुम्भ, धूम्राक्ष, चण्ड—मूण्ड, रक्तबीज, मधु—कैटभ, महिषासुर आदि राक्षसों का वध किया है, वैसे ही दुर्गमासुर का वध कर हमारा कल्याण करें।” माँ भगवती ने कहा—” देवताओं ! तुम्हारी इच्छा पूर्ण होगी।” तभी देवी ने दुर्गमासुर के वध का संकल्प ले लिया।

इधर दुर्गमासुर को जब देवी के संकल्प का ज्ञान हुआ, तब वह अपने असुर सेना के साथ देवलोग पहुँचा। देवी भी इस असुर से युद्ध के लिए आ गईं। दैत्य दर्गमासुर ने सेना सहित माँ भगवती पर आक्रमण किया। तब देवी के दिव्य शरीर से काली, तारा, छिन्नमस्ता, षोड़शी, भुवनेश्वरी, त्रिपुरभैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला रूपवाला दश महाविद्याएँ प्रकट हुईं। इन महाविद्याओं ने राक्षसी सेना को समाप्त कर दिया। जब देवी ने अपने त्रिशूल से दुर्गमासुर का वध कर दिया, कहा जाता है कि तब देवी का नाम दुर्गा पड़ा। यहाँ भवानी का नाम शताब्दी का नाम शताक्षी और शाकम्भरी भी है, जो अपने भक्तों की दुर्गति का नाश करने वाली हैं। इन्हें दुर्गा कहा गया है।

माँ दुर्गा की शक्तियों में दश महाविद्याओं का उल्लेख सिर्फ इतना ही है। इन ​महाविद्याओं का परम्परागत सम्बन्ध सती, शिवा और पार्वती से है। ये ही अन्यत्र नवदुर्गा, शक्ति चामुण्डा, विष्णुप्रिया आदि नामों से पूजे जाते हैं।

महाभागवतपुराण— में दश महाविद्याओं के प्रादुर्भाव के संबंध में कहा गया है— एक बार दक्ष प्रजापति ने सभी देवताओं तथा महर्षियों को अपने यज्ञ में बुलाया, किन्तु द्वेष भाव के कारण शिवजी को नहीं बुलाया। सती को जब पता चला कि उनके पिता दक्ष यज्ञ कर रहे हैं तो उन्होनें यज्ञ में जोन की अपने पति शिवजी से अनुमति माँगी। शिवजी ने उन्हें जाने से रोका। लेकिन सती अपने निश्चय पर अटल रहीं। उनके नेत्र लाल हो गए और वह​ शिव को उग्र दृष्टि से देखने लगीं। सती के अधर फड़कने लगे, रंग काला हो गया। क्रोधाग्नि से दग्ध उनका शरीर भयानक दिखने लगा। उस समय महामाया का विग्रह प्रचण्ड तेज से तमतमा रहा था। कालाग्नि के समान भयानक रूप से देवी ने मुण्डमाला पहनी और उनकी भयानक जिहृवा बाहर निकली । शीश पर अर्धचन्द्र था और उनका सम्पूर्ण व्यक्तित्व विकराल लगने लगा। वे बार—बार विकट हुंकार कर रही थीं। देवी का यह स्वरूप साक्षात् महादेवजी के लिए प्रचण्ड था। देवी के इस विकराल रूप को देख शिवजी भागे। भागते हुए उनको दसों दिशाओं में रोकने के लिए देवी ने अपनी अंगभूता दस देवियों को प्रकट किया। देवी की ये स्वरूपा शक्तियाँ ही दश महाविद्याएँ हैं, जिनके नाम हैं— 1.काली, 2.तारा, 3.छिन्नमस्ता, 4.षोड़शी, 5.भुवनेश्वरी, 6.त्रिपुरभैरवी, 7.धूमावती, 8.बगलामुखी, 9.मातंगी और 10.कमला।

देवी के उग्र और सौम्य रूप दो रूपों में ही दश महाविद्या निहित हैं। तारा, छिन्नमस्ता, बगला और धूमावती उग्र रूप हैं और भुवनेश्वरी, षोड़शी(ललिता), त्रिपुरभैरवी, मातंगी और कमला सौम्य रूप है। Ma Durga ki Kahani In Hindi

 

माँ दुर्गा की उत्पत्ति की कहानी/Maa Durga ki Utpatti in Hindi Ma Durga ki Kahani

माँ दुर्गा को आदि शक्ति, भवानी और जगदम्बा जैसे कई नामों से पूजते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार राक्षसों का सर्वनाश करने के लिए माँ दुर्गा अवतरण हुआ है। इसीकारण हम नवरात्र में माँ दुर्गा का श्रद्धा पूर्वक पूजा करते है। नवरात्र में पूजा करने से श्रद्धा और भक्ति का फल जल्दी मिलता है।  माँ को प्रसन्न करने के लिए पूर्ण विधि—विधान से पूजा—पाठ एवं दुर्गासप्तशती का पाठ किया जाता है।

प्राचीन कथा के अनुसार महिषासुर एक शक्तिशाली असुर था वह इंसान वह भैंसे का रूप धारण कर सकता था। उन्होनें अमरत्व का वरदान प्राप्त करने के लिए ब्रहमा जी का कठिन तपस्या की। ब्रहमाजी उसके तप से प्रसन्न होकर इच्छानुसार वर मांगने को कहा। महिषासुर ने उनसे अमर होने का वरदान मांगा ब्रहम जी ने कहा जिस जीव की मृत्यु होती है उसकी मृत्यु निश्चित होती कोई अन्य वरदान मांगो। महिषासुर ने कहा आप मुझे यह वरदान दीजिए कि मुझे देवता, असुर और कोई भी मुझे न मार पाये और मेरी मृत्यु किसी स्त्री के हाथ हो।ब्रहमा जी ने कहा ऐसा ही होगा। वरदान के अहम में महिषासुर ने तीनों लोकों पर आतंक मचाना शुरू कर दिया  तब देवताओं ने महिषासुर से अक्रांत होकर सभी देवताओं ने माँ दुर्गा की अस्तुति की और तब जाकर देवी की उत्पति हुई देवी के साथ महिषासुर का नौ दिनों तक भीषण युद्ध चला माता ने उसका वध किया देवी की अट्टास से करोड़ों—अरबों असुर मुत्यु को प्राप्त हुए।

 

Kalash Sthapana Vidhi/दुर्गा पूजा कलशस्थापन विधि 

अखण्ड दीप के मध्य, चौकी के आगे मिट्टी बिछाकर, उस पर जौ छिड़कर मृत्तिका—कलश ‘मही द्यौ: पृथ्वी च न0’ मन्त्र पढ़कर कलशपूजन विधि से स्थापित करें। कलशस्थापन के बाद ‘नारिकेलबलये नम:’ मंत्र पढ़कर पंचोपचार से नारिकेल(नारियल) की पूजा कर, देवी के आगे ‘नारिकेलबलिं तुभ्यं समपर्यामि’ कहकर, नवार्ण मंत्र ऊँ ऐं ह्नीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे पढ़ते हुए एक हाथ से एक ही बार में नारियल देवी के सामने फोड़कर समर्पित करें। नारियल फोड़ते समय दोनों धुटने जमीन पर टेक कर बैंठे। बटूक—कुमारिका पूजन— दाहिने हाथ में अक्षत और फूल लेकर, ‘करकलित—कपाल:0’ श्लोक पढ़कर ‘बं बटुकाय नम:’ से बटुक, ‘मंन्त्राक्षरमयीं0′ तथा कुमार्यै नम:’ से कुमारी की पूजा कर, दोनों के मस्तक में तिलक लगाकर, मीठा और दक्षिण अर्पण कर प्रणाम करें। ब्राह्मण पूजन— ‘ब्रह्मणे नम:’ कहकर पाठ करने वाले सभी ब्राह्मणों को गन्ध(रोली), अक्षत एवं पुष्प से पूजन करें। सरस्वती पूजन— ‘पावका न: सरस्वती0’ मन्त्र तथा ‘नमो देव्यै0’ श्लोक पढ़कर दुर्गासप्तशती पुस्तक की पूजा चन्दन, अक्षत और पुष्प से करे। इसके बाद दुर्गासप्तशती का पाठद शुरू करे। अगर आप के पास ब्राह्मण नहीं तो भी आप अपने से पढ़कर कलशस्थापन कर सकते हैं।

 

माँ दुर्गा की आरती/Ma Durga Ki Aarti

जय अम्बे गौरी मैया जय श्याम गौरी ।

तुमको निशिदिन ध्यावत हरि ब्रह्मा शिवरी ।।

माँग सिंदूर विराजत टीको मृगमद को ।

उज्ज्वल से दोउ नैना चन्द्रबदन नीको ।। जय।।

कनक समान कलेवर रक्ताम्बर राजै ।

रक्तपुष्प गलमाला कंठन पर साजै ।।  जय।।

केहरि वाहन राजत खड्ग खप्परधारी ।

सुर—नर मुनिजन सेवक तिनके दु:खहारी ।। जय।।

कानन कुंडल शोभित नासाग्रे मोती ।

कोटिक चन्द्र दिवाकर राजत सम ज्योति ।। जय।।

शुम्भ निशुम्भ विडारे महिषासुर घाती ।

धूम्र विलोचन नैना निशिदिन मदमाती ।। जय।।

चौंसठ योगिनी गावत नृत्य करत भैरूँ ।

बाजत ताल मृदंगा अरू बाजत डमरू ।। जय।।

तुम हो जग की माता तुम ही हो भर्ता ।

संतन की दु:खहर्ता सुख सम्पत्ति कर्ता ।। जय।।

भुजा चार अति शोभित खड्ग खप्परधारी ।

मनवांछित फल पावत सेवत नर नारी ।। जय।।

कंचन थार विराजत अगर कपूर बाती ।

श्री मालकेतु में राजत कोटि रतन ज्योति ।। जय।।

श्री अम्बेजी की आरती जो कोई नर गावै ।

कहत शिवानंद स्वामी सुख—सम्पत्ति पावै ।। जय।।

 

किसी भी देवी या देवता की आरती करने का प्रावधान सुबह और शाम के समय किया जाता है या पूजा विधि समाप्ती के बाद किया जाना चाहिए। सभी सुखों को देने वाली माँ दुर्गा की की मुख्य आरती ‘जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी को माना जाता है। इस आरती में त्रिदेव के द्वारा माँ दुर्गा की महिमा के गुणगान करते बताया गया है। इस आरती में माँ के सुहागन रूप और माँ काली के क्रूर रूप के बारे में भी गुणगान किया गया है। प्रतिदिन स्न्नान करने के बाद सुबह और शाम के समय दुर्गा आरती करने से व्यक्ति का मन शांत महसूस होता है। इसके अलावा वह बुराईयों से दूर रहता है। प्रतिदिन आरती करने से आपका जीवन सुखमय हो जाता है।

किसी भी देवी—देवता के आरती करने से पहले उनकी चौदह बार आरती उतारें। चार बार चरणों पर की, चार बार नाभि की, एक बार मुख पर तथा सात बार पूरे शरीर पर से आरती करने का नियम है आरती की अगरबत्ती की संख्या बिषम यानि 1,3, 5 में होनी चाहिए।

 

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